परिचय
प्रणव मंत्र 'ॐ' को कहा जाता हैं। इसे ओंकार के रूप में भी जाना जाता हैं। यह एक शक्तिशाली मंत्र हैं। इसे ब्रह्मांड की मूल ध्वनि भी माना जाता हैं। वैज्ञानिको ने भी अपनी खोज यह बताया है कि अंतरिक्ष में लगातार एक ध्वनि सुनाई देती हैं जो कि ॐ के समान ही हैं। इसलिए माना जा सकता हैं कि ॐ ही समस्त संसार में व्यापत हैं। प्रत्येक मंत्र की शुरुआत भी ॐ से ही होती हैं।
प्रणव मंत्र का अर्थ
ॐ शब्द तीन अक्षर ध्वनी - अ, उ और म से मिलकर बना हैं। पहला अक्षर ‘अ’ जो कंठ से, दूसरा ‘उ’ जो हृदय से, तीसरा ‘म्’ जो नाभि में कम्पन करता हैं। इस सर्व व्यापक पवित्र ध्वनि के गुंजन का हमारे शरीर की नाडिय़ों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता हैं। यह तीनों अक्षर ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी हैं और यह भू लोक, भव लोक और स्वर्ग लोग का भी प्रतीक माने जाते हैं।
प्रणव मंत्र का उद्देश्य
योगियों में यह विश्वास हैं कि इसके अंदर मनुष्य की सामान्य चेतना को परिवर्तित करने की शक्ति हैं। यह मंत्र मनुष्य की बुद्धि व देह में परिवर्तन लाता हैं। ॐ से शरीर, मन, मस्तिष्क में परिवर्तन होता हैं और वह स्वस्थ हो जाता हैं। ॐ के उच्चारण से फेफड़ों में, हृदय में स्वस्थता आती हैं। शरीर, मन और मस्तिष्क स्वस्थ और तनावरहित हो जाता हैं। ॐ के उच्चारण से वातावरण शुद्ध होता हैं।
प्रणव मंत्र का वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया हैं कि अंतरिक्ष में लगातार एक ध्वनि उत्पन्न हो रही हैं इसी ध्वनि को हमारे तपस्वी और ऋषि मुनियों ने ध्यान अवस्था में सुना। जो शरीर के अंदर और बाहर निरंतर सुनाई देती हैं। और उसे सुनने से मन और आत्मा को शांति मिलती हैं। उन्होंने इस ध्वनि को ब्रह्मानाद अथवा ॐ कहा हैं। अर्थात ‘ओ३म्’ ही अनादिकाल से अनन्त काल तक ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं।
प्रणव मंत्र के शारीरिक लाभ
- सम्पूर्ण शरीर को तनाव मुक्त रखता हैं।
- हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता हैं।
- शरीर की पाचन शक्ति को बढ़ाता करता हैं।
- युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार करता हैं।
- अनिद्रा और माइग्रेन जैसी बीमारी को ठीक करता हैं।
- शरीर के विषाक्त तत्वों को बाहर करता हैं।
- घबराहट और बैचनी को कम करता हैं।
- निराशा और गुस्से को समाप्त करता हैं।
- जीवन को जीने की शक्ति प्राप्त होती हैं।
- बुरे विचारों का समूल नाश होता हैं।
- सकारात्मक विचारों का सृजन होता हैं।
- कार्य करने के लिए एकाग्रता बढ़ती हैं।
- निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता हैं।
- प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल और नियंत्रण होता हैं।
- ईश्वर की निकटता का अनुभव होता हैं।
- जीवन का अंतिम लक्ष्य दिखाई देता हैं।
- मन से मृत्यु का भय समाप्त होता हैं।
- सांसारिक मोह माया का बंधन समाप्त होता हैं।
- आत्मा शुद्ध और निर्मल बनती हैं।
- ईश्वर में सर्व समर्पण का भाव पैदा होता हैं।
- स्वयं के आत्म स्वरूप का बोध होता हैं।
- मंत्र का उच्चारण शुद्ध करना चाहिए।
- मंत्र करते समय विश्वास रखना चाहिए।
- तन एवं मन में स्वच्छता का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।
- मंत्र के समय एकाग्रचित रहना चाहिए।
- आसन पर बैठकर ही मंत्र साधना करनी चाहिए।
- मंत्र का जाप एकांत में और शांति से करना चाहिए।
- मंत्र का जाप सुबह या शाम को करना चाहिए।
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